ट्रंप का टैरिफ वार: भारत-अमेरिका संबंधों की नई परीक्षा
कटिहार, 14 अगस्त 2025 :हाल के दिनों में नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत-अमेरिका संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर दिखाई दे रहे हैं। 6 अगस्त 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की। यह कदम 1 अगस्त 2025 को लागू की गई 25% ड्यूटी के बाद आया, जो भारत द्वारा रूस से तेल आयात जारी रखने के कारण लगाया गया था। यह शुल्क किसी भी अन्य अमेरिकी व्यापारिक साझेदार पर लगाए गए शुल्क से सबसे अधिक था। इसका सबसे बड़ा असर वस्त्र और परिधान क्षेत्र पर पड़ा है, जबकि।पाकिस्तान, वियतनाम और श्रीलंका जैसे एशियाई प्रतिस्पर्धियों ने अमेरिका को अपने निर्यात बढ़ा दिए हैं, क्योंकि उन पर लगने वाला शुल्क बहुत कम है। बड़ी संख्या में व्यापारी, जो इन उत्पादों का निर्यात अमेरिका को करते थे, उन्होंने अपने निर्यात बंद कर दिए हैं
क्योंकि अगर यह तनाव खत्म नहीं हुआ तो वे भविष्य में ऐसे नुकसान सहन नहीं कर पाएंगे।
इस बढ़े हुए शुल्क का कारण क्या है?
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फरवरी में ही प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिका दौरा हुआ था और हमने ट्रम्प और मोदी के बीच काफी खुशगवार माहौल देखा था, लेकिन फिर भी ऐसा क्या हुआ कि भारत-अमेरिका संबंध बिगड़ गए अमेरिका का आधिकारिक कारण यह है कि भारत का रूस से ऊर्जा आयात चिंताजनक है, इसलिए वे भारत पर शुल्क लगा रहे हैं। लेकिन रूस से तेल आयात कोई नई बात नहीं है – यूरोपीय संघ द्वारा रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर कई प्रतिबंध लगाने के बाद से ही भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से तेल खरीद रहा है। पहले भारत रूस से तेल नहीं खरीदता था क्योंकि यह महंगा था। यूरोपीय संघ ही रूस से बड़े पैमाने पर URAL तेल खरीदता था। यूरोप के प्रतिबंधों के बाद Ural तेल के दाम गिर गए और भारत व चीन ने इसका आयात शुरू किया।
आज की तारीख में, अगर हम कुल ऊर्जा आयात का हिसाब लगाएं, तो भारत यूरोप, चीन और स्वयं अमेरिका की तुलना में बहुत पीछे है। तो फिर कोई देश कैसे किसी अन्य देश पर युद्ध को फंड करने का आरोप लगा सकता है, जबकि वह खुद उससे ज्यादा आयात कर रहा है?
हाल ही में पाकिस्तान के आतंकवादियों द्वारा पहलगाम हमले में कई निर्दोष पर्यटकों की जान चली गई। इसके बाद भारत ने “ऑपरेशन “सिंदूर” के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया। इस पर अमेरिका की पुरानी “ग्लोबल पुलिस” वाली सोच और ट्रम्प के नोबेल शांति पुरस्कार पाने के सपने ने उन्हें यह दावा करने पर मजबूर किया कि उनके मध्यस्थता के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम हुआ। पाकिस्तान ने इस दावे को खुलेआम स्वीकार किया, लेकिन भारत ने इस बयान का कड़ा खंडन किया और कई बयान देकर अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे को गलत साबित किया।
भारत की यह सख्त विदेश नीति शायद ट्रम्प को हैरान कर गई, क्योंकि मोदी सरकार किसी को खुश करने के लिए अपने राष्ट्रीय हित से समझौता नहीं करती। जो देश अपने हथियार निर्माण उद्योग में भारी निवेश करता है, वह वैश्विक शांति की प्रार्थना कैसे कर सकता है?
रूस – यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत का शांति के पक्ष में सख्त रुख भी चर्चा में रहा। भारत के विदेश मंत्री श्री एस. जयशंकर का यह बयान कि “यूरोप को यह सोचना बंद करना चाहिए कि उनकी समस्याएं ही वैश्विक समस्याएं हैं”, इस नई भारत की सोच को दर्शाता है। इसके बावजूद, ट्रम्प के बेटे और उनके भारतीय निवेशक भारत के मुंबई, पुणे, गुरुग्राम और कोलकाता जैसे शहरों में ट्रम्प टॉवर से करोड़ों डॉलर का राजस्व कमा रहे हैं – जबकि ट्रम्प पहले भारत की
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अर्थव्यवस्था को “डेड इकॉनमी ” कह चुके हैं।
अमेरिका पाकिस्तान को अमेरिकी धरती पर यह भी कहने की छूट दे रहा है कि वह “आधे विश्व को परमाणु हथियार से नष्ट कर सकता है”। ऐसे बयान दिखाते हैं कि एक देश का नेता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किस हद तक जा सकता है, भले ही इससे राष्ट्रीय हित प्रभावित हो जाए ।
भारत और अमेरिका कई मंचों पर रणनीतिक साझेदार के रूप में काम कर रहे हैं। हाल ही में 30 जुलाई को भारत और अमेरिका ने संयुक्त रूप से दुनिया का सबसे महंगा पृथ्वी अवलोकन मिशन (Earth Observation Mission) “NISAR” लॉन्च किया, और कुछ ही महीनों में भारत एक अमेरिकी संचार उपग्रह “ब्लॉक-2 ब्लूबर्ड” (वजन 6,500 किलो) भी लॉन्च करने वाला है।
आगे की राह आने वाले दिनों में दो बड़े आयोजन होना तय हैं
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पहला 2015 के बाद 15 अगस्त यानी शुक्रवार को पहली बार रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति की मुलाकात अलास्का में होगी। यह बैठक भारत पर लगे शुल्क को लेकर अमेरिकी रुख बदल सकती है। दूसरा 25 अगस्त भारत, अमेरिका द्विपक्षिय ट्रेड के लिए अमेरिका से वार्ताकार भारत आएंगे। इन बैठकों से क्या नतीजे निकलते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
भारत पर शुल्क का असर हमारे निर्यात और व्यापारियों पर पड़ेगा। भारत सरकार को चाहिए कि वह व्यापारियों और किसानों को राहत देने के उपाय करे, ताकि इसका असर ज्यादा न हो। 6 अगस्त को भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की इस कार्रवाई को “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण, अनुचित और अव्यावहारिक” बताया और भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा का संकल्प लिया।
7 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वे भारत के किसानों, मछुआरों और डेयरी उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए “व्यक्तिगत रूप से कीमत चुकाने” को तैयार हैं। रूस से तेल छोड़ना या अमेरिकी बाज़ारों को छोड़ना – भारत इन दो ‘जटिल’ विकल्पों के बीच राष्ट्र हित में खड़ा है। यह भारत के लिए मौका है कि वह अपने निर्यात गंतव्यों को विविधतापूर्ण बनाए और उन देशों को लक्ष्य करे जो अभी हमारे शीर्ष निर्यात गंतव्यों में शामिल नहीं हैं।
लेखक: श्रेष्ठ कुमार
(भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय में इंटर्न व
गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के विधि छात्र)


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